प्रकृति ने गौचर को एक विशाल समतल मैदान का उपहार दिया है, जो उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सबसे बड़े खुले मैदानों में से एक है। इस मैदान ने गौचर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अतीत में इस मैदान का उपयोग हवाई पट्टी (airstrip) के रूप में किया गया है और इसने कई महान हस्तियों की आगवानी की है। यह क्षेत्र के सबसे बड़े व्यापारिक मेलों में से एक का आयोजन स्थल भी रहा है।
यह समतल भूमि गढ़वाल के पंवार राजाओं की संपत्ति थी, जिसे उन्होंने इतिहास के किसी कालखंड में श्री बद्रीनाथ मंदिर को दान कर दिया था। यह जमीन आज भी बद्रीनाथ मंदिर के अधीन है, इसलिए इसका उपयोग कृषि या किसी अन्य व्यावसायिक उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। (इसी कारण और प्रशासनिक भवनों तथा बड़े रनवे की आवश्यकता को देखते हुए, गौचर की नई हवाई पट्टी का निर्माण अलग से कृषि भूमि पर किया गया है।)
गौचर को सबसे पहले 1920 के दशक में पहचान मिली, जब भारत के तत्कालीन वायसराय की पत्नी लेडी विलिंगडन यहाँ विमान से उतरी थीं। इसके बाद, 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू अपनी बहन विजया लक्ष्मी पंडित के साथ बद्रीनाथ की व्यक्तिगत यात्रा के दौरान हवाई मार्ग से यहाँ आए थे। उस समय हवा की दिशा जांचने के लिए मैदान में गाय का गोबर जलाया जाता था!
वर्ष 1943 से गौचर उत्तराखंड के सबसे बड़े व्यापारिक मेलों में से एक का आयोजन करता आ रहा है। गढ़वाल हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले चमोली जिले के भोटिया जनजाति के लोग ऊन के प्रसंस्करण, रंगाई और पारंपरिक ऊनी वस्त्र बनाने की अपनी विशिष्ट कला के लिए प्रसिद्ध हैं। वर्ष 1962 से पहले भारत और तत्कालीन तिब्बत के बीच सीमा-पार व्यापार होता था, और ऊन का आयात भोटिया समुदाय के पारंपरिक कुटीर उद्योग की आय का मुख्य स्रोत था। लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया।
इसके बाद गौचर मेला भोटिया समुदाय के लिए अपने ऊनी उत्पादों, कीमती रत्नों और हींग को बेचने तथा बदले में दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं (जैसे कपड़ा और नमक) खरीदकर वापस ले जाने का एक बहुत बड़ा बाजार बन गया। यह केवल एक स्थानीय मेला नहीं था, बल्कि बिजनौर और कोटद्वार जैसे दूर-दराज के इलाकों से भी लोग व्यापार में भाग लेने के लिए यहाँ आते थे।
व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, लगभग 1000 ईस्वी से 1803 तक गौचर (पूरे गढ़वाल की तरह) पर पाल राजवंश का शासन था, जिसे बाद में शाह राजवंश के रूप में जाना गया। 1803 में, इस क्षेत्र में आए भीषण भूकंप का फायदा उठाकर गोरखाओं ने गढ़वाल की ओर रुख किया, जिसमें इस क्षेत्र की एक-तिहाई आबादी मारी गई थी। उस समय प्रद्युम्न शाह यहाँ के राजा थे, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए और गढ़वाल का राज्य उनके हाथ से निकल गया।
गढ़वाल के अन्य हिस्सों की तरह गौचर भी 1803 से 1815 तक गोरखा शासन के अधीन रहा। 1815 में अंग्रेजों ने अलकनंदा और मंदाकिनी के पूर्वी हिस्से को राजधानी श्रीनगर सहित 'ब्रिटिश गढ़वाल' में मिला लिया। शुरुआत में इस क्षेत्र का प्रशासन देहरादून और सहारनपुर से चलाया जाता था। हालांकि, बाद में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में एक नया जिला स्थापित किया और इसका नाम 'पौड़ी' रखा। आज का चमोली — और गौचर — उस समय पौड़ी की एक तहसील हुआ करता था।
24 फरवरी 1960 को स्वतंत्र भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में चमोली तहसील को एक नए जिले के रूप में उन्नत किया गया। इसके बाद वर्ष 1994 में गौचर को नगर पंचायत का दर्जा प्राप्त हुआ।